मानवता-ग्रन्थ १
जीव २ ईश्वर का दृष्टान्त ३ है। जीवन्त ब्रह्माण्ड ४ न काल जानता है, न समय। सदा-सर्वदा वह विद्यमान है, वह नित्य जीवित रहता है। ब्रह्माण्ड का जीव अत्यन्त उच्च, सूक्ष्म और असीम गगन के समान है। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त करता है। वह सर्वत्र विद्यमान है, उस परोक्ष गगन ५ के समान जो समस्त वस्तुओं को व्याप्त करता है, चाहे वे दृश्य हों अथवा अदृश्य। समस्त परम पूर्णता का स्रोत ब्रह्माण्ड का जीव है। समस्त नित्य सौन्दर्य का स्रोत उसी में है। समस्त परम ज्ञान का स्रोत वही है। शक्ति के समस्त रहस्यों का स्रोत वही है ६। राज्य, वचन तथा समस्त वस्तुएँ उसी में हैं। महापवित्र है वह समस्त पूज्यों से परे, वही ब्रह्माण्ड का राजा और सम्पूर्ण आकाश का प्रकाश है। वही ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता है। वही ईश्वर का परोक्ष गगन है जो समस्त वस्तुओं में महाव्यापी है, गुण अथवा नाम से परे ७ पवित्र, वही एक है, नित्य और शाश्वत।
वही आदि और अन्त है। वही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का साक्षात् सृष्टिकर्ता ८ है। महापवित्र है वह समस्त वाणी और शब्द से परे, वह सदा-सर्वदा जाना न जाएगा।
इंसान ९ महाकृपालु ईश्वर के गगन से विनती करता है, अपनी परम महिमामयी रहमत से इंसान पर करुणा कर १०, ताकि वह तेरे परम सुन्दर मुख के प्रकाश को जान सके। वही ब्रह्माण्ड का अल्लाह ११ है।
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पाद-टिप्पणियाँ:
१ शीर्षक में 'ग्रन्थ' शब्द 'पुस्तक' अथवा 'किताब' के स्थान पर चुना गया है; हिन्दी प्रयोग में 'ग्रन्थ' धर्मग्रन्थ एवं प्रामाणिक कृति का द्योतक है, जो इस पाठ की प्रतिष्ठा के अनुरूप है।
२ मूल शब्द jiwa संस्कृत 'जीव' ही है, और इस अनुवाद में वह अपने मूल रूप में लौटा है। मूल पाठ एक ही शब्द से व्यष्टि के जीव और ब्रह्माण्ड के जीव को कहता है — दोनों का एकत्व ही इस ग्रन्थ की शिक्षा है — अतः दोनों अर्थों में एक ही शब्द 'जीव' रखा गया है। वस्तुतः मूल पाठ संस्कृत-मूल शब्दावली से समृद्ध है: jiwa (जीव), maha (महा), nama (नाम), raja (राजा), kerajaan (राज्य), karunia (करुणा), angkasa (आकाश), pujaan (पूजा-मूल), semesta (समस्त)। अतः यह अनुवाद अनेक स्थलों पर अनुवाद नहीं, मूल धातुओं की पुनःस्थापना है। maha को वहाँ 'महा' रखा गया है जहाँ हिन्दी समास सहज है (महापवित्र, महाकृपालु, महाव्यापी), अन्यत्र 'परम' — जो स्वयं संस्कृत है। 'alam semesta' हेतु मानक 'ब्रह्माण्ड' रखा गया है, जो स्वयं संस्कृत है।
३ मूल शब्द kiasan अलंकार-सामान्य (उपमा, रूपक, प्रतीक आदि) का व्यापक वाची है; निकटतम एकल पद के रूप में 'दृष्टान्त' चुना गया है।
४ शब्दशः पाठ होगा 'ब्रह्माण्ड का जीवन'; समाउल्लाह के सचिव एवं अनुवादक ताजुद्दीन चौधरी ने इसे 'जीवन्त ब्रह्माण्ड' पढ़ा। यह विरल व्याख्यात्मक चयन यहाँ यथावत् रखा गया है।
५ langit gaib इस पाठ से पूर्ववर्ती इस्लामी रहस्यवादी अवधारणा है ('आलम-ए-ग़ैब') — सत्ता का वह अगोचर आध्यात्मिक आयाम जो सबमें व्याप्त है। 'परोक्ष' (इन्द्रिय-गोचर से परे) 'ग़ैब' का सटीक संस्कृत प्रतिरूप है और 'अदृश्य' से पृथक् रहता है, जैसे मूल में gaib और tidak kelihatan पृथक् शब्द हैं। langit हेतु 'गगन' चुना गया है ताकि 'आकाश' अपने वास्तविक सजात angkasa के लिए सुरक्षित रहे।
६ मूल में यह वाक्य खण्डित है; पूर्ववर्ती वाक्यों से अन्वित 'वही है' पठनीयता हेतु जोड़ा गया है।
७ मूल में sifat (अरबी 'सिफ़ात') — ईश्वरीय गुणों का पारिभाषिक पद; 'गुण' उसका प्रतिष्ठित भारतीय प्रतिरूप है। गुण और नाम से परे परम सत्ता की यह घोषणा वही सिद्धान्त है जिसे भारतीय परम्परा 'निर्गुण' कहती है। तथापि मूल पाठ पारिभाषिक पद नहीं, वर्णनात्मक वाक्यांश प्रयोग करता है; अतः अनुवाद भी वाक्यांश ही रखता है और सैद्धान्तिक अभिज्ञान इस टिप्पणी को सौंपता है।
८ मूल में द्वितीय उल्लेख पर pencipta (सृष्टिकर्ता) के आगे sang जुड़ता है — सम्मानित सत्ताओं हेतु प्रयुक्त एक नाटकीय-आदरसूचक उपपद। हिन्दी में यह भाव 'साक्षात्' द्वारा व्यक्त किया गया है।
९ 'इंसान' मूल का शब्द ज्यों का त्यों है और हिन्दी में पूर्णतः प्रचलित है। यह 'इंसान-ए-कामिल' (पूर्ण मानव) की अवधारणा की ओर संकेत करता है: सन्त वे हैं जिन्होंने स्वयं को शुद्ध कर यह पद पाया। यह ग्रन्थ 'अल-इंसान' द्वारा और इंसान के लिए लिखा गया है — विनम्र प्रतीत होते हुए भी यह गम्भीर धार्मिक उद्घोष है, जो मनुष्य को पूर्ण सत्ता बनने का मार्ग देता है। 'इंसान' शब्द लिंग-निरपेक्ष है।
१० मूल karunialah प्रत्यक्ष आज्ञार्थ है (-lah प्रत्यय); अनुवाद में भी प्रत्यक्ष विनय-आज्ञा 'करुणा कर' रखी गई है — 'तू' सम्बोधन भक्ति-परम्परा में ईश्वर के आत्मीय सम्बोधन का मानक रूप है। इसी वाक्य में संस्कृत-मूल karunia (करुणा) और अरबी-मूल rakhmat (रहमत) साथ-साथ आते हैं; अनुवाद ने दोनों के मूल स्वरूप सुरक्षित रखे हैं — मूल की द्विस्रोतीय बुनावट का प्रतिबिम्ब।
११ मूल पाठ ईश्वर हेतु सर्वत्र Tuhan का प्रयोग करता है और समापन में सप्रयोजन Allah का — यह दर्शाने हेतु कि जो नामों से परे है, उसे किसी भी नाम से पुकारो, सत्ता एक ही है। अनुवाद इस युक्ति को यथावत् रखता है: सम्पूर्ण पाठ में 'ईश्वर', समापन में 'अल्लाह'। हिन्दी पाठक के लिए यह विशेष बल से उतरती है — ईश्वर कहो या अल्लाह, परमात्मा एक है।
इंसान
इंसान एक ऐसा मनुष्य है जो पूर्ण है। १२ समस्त गुण जो पूर्णता की ओर ले जाते हैं, भले हैं। मनुष्य को इन शुभ गुणों को साकार करना चाहिए। १३ संसार में मनुष्य के अस्तित्व के आरम्भ से ही वे उन चरणों को प्राप्त करते जाएँगे जो परम पूर्णता की ओर ले जाते हैं, तथापि मनुष्य समस्त परम पूर्णता को प्राप्त करने में समर्थ न होंगे, क्योंकि वे ही ब्रह्माण्ड का जीव हैं। १४, १५ किन्तु उन्हें उन सत्यों के निकट पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए जो ज्ञान के संसार में विद्यमान हैं। मनुष्य आरम्भ से लेकर वर्तमान काल तक और आगे निरन्तर परम पूर्णता के गगन की ओर बढ़ते जाते हैं। इंसान समस्त पूर्णता के गुणों का स्रोत है। समस्त गुण जो मूल्यवान् और भले हैं, पूर्ण इंसान से साकार हो सकते हैं। १६ वह ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक मूल्यवान् सृष्टि है। १७ किसी इंसान को उन बातों को खोजने का प्रयत्न करना चाहिए जो उसे पूर्ण लोक तक ले जाएँ। जब कोई मनुष्य समस्त भलाई करने में सफल हो, तब वे समस्त इंसानों द्वारा प्रेम किए जाएँगे। १८ मनुष्य को प्रत्येक क्षेत्र में स्वयं को पूर्ण करने का प्रयत्न करना चाहिए। समस्त नबियों तथा ज्ञान के आचार्यों का लक्ष्य मनुष्य की भलाई तथा पूर्णता है।
प्रत्येक मनुष्य के निज स्वरूप में वह प्रतिभा पहले से ही विद्यमान है जिससे वे भली बातों को खोज सकें, तथा व्यर्थ से भेद कर सकें। १९ जैसे प्रत्येक मनुष्य मीठे और कड़वे का स्वाद जान सकते हैं, वैसे ही वे मूल्यवान् गुणों को व्यर्थ से जान सकते हैं। २०
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पाद-टिप्पणियाँ:
१२ 'इंसान' और 'मनुष्य' मूल के insan तथा manusia के प्रतिरूप हैं। इंडोनेशियाई में दोनों शब्द मानव के वाची हैं, किन्तु इस प्रकरण में 'इंसान' 'इंसान-ए-कामिल' — पूर्ण मानव — की ओर संकेत करता है, और 'मनुष्य' उस व्यक्ति की ओर जो इंसान की स्थिति प्राप्त करने की प्रक्रिया में है। इसी भेद पर इस अध्याय का प्रथम वाक्य आधारित है; दोनों को एक ही शब्द से अनूदित करने पर वह वाक्य पुनरुक्ति मात्र रह जाता है।
१३ 'भला' तथा 'शुभ' दोनों मूल के एक ही शब्द baik के अनुवाद हैं — प्रथम सत्तात्मक अर्थ में, द्वितीय प्रवृत्त्यात्मक अर्थ में।
१४ 'वे' यहाँ एकवचन, आदरार्थक तथा लिंग-निरपेक्ष रूप में प्रयुक्त है, बहुवचन के सामान्य अर्थ में नहीं। मूल का dia लिंग-निरपेक्ष है, किन्तु हिन्दी क्रिया लिंग धारण करती है; अतः 'मनुष्य' के लिए सर्वत्र आदरार्थक बहुवचन रखा गया है, जिससे मूल की लिंग-निरपेक्षता सुरक्षित रहे। 'इंसान' के लिए, जहाँ मूल पुरुषवाची संकेत करता है, एकवचन 'वह' रखा गया है।
१५ मूल का dialah यहाँ 'वे ही' रूप में अनूदित है, जबकि प्रथम पृष्ठ पर वही रूप ईश्वर के लिए 'वही' आया है। यह चयन व्याख्यात्मक है: वाक्य में सर्वनाम का निर्देश्य अस्पष्ट है, और अन्य अनुवादकों ने इसे 'परम पूर्णता' का वाची माना है। यहाँ यह मनुष्य की ओर संकेत करता है, जो अद्वैत दृष्टि से ईश्वर से अभिन्न है — यही आगे पुष्ट होता है जहाँ इंसान को समस्त पूर्णता का स्रोत कहा गया है। मनुष्य-चेतना में स्थित होने के कारण मनुष्य समस्त पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता, यद्यपि वास्तव में वही ईश्वर है; इंसान वह है जो ईश्वर-चेतना में स्थित होकर इस अभिन्नता को जानता है, और इसीलिए समस्त पूर्णताएँ उसमें स्वभावतः विद्यमान हैं।
१६ मूल का indah सामान्यतः सौन्दर्य का वाची है, किन्तु उसका प्राचीनतर अर्थ मूल्य, महत्त्व एवं आदर का है — वही अर्थ जो mengindahkan ('ध्यान देना, आदर करना') में सुरक्षित है। यह अध्याय सौन्दर्य का नहीं, नैतिक मूल्य का प्रकरण है; अतः 'मूल्यवान्' रखा गया है। 'सुन्दर' रखने पर पृष्ठ के अन्त का नैतिक विरोध शिथिल पड़ जाता।
१७ 'सर्वाधिक मूल्यवान् सृष्टि' मूल के ciptaan yang terindah का अनुवाद है, जो अरबी 'अशरफ़ुल-मख़्लूक़ात' (सृष्ट वस्तुओं में श्रेष्ठतम) की ओर संकेत करता प्रतीत होता है। यह संकेत इस बात की पुष्टि करता है कि यहाँ indah का प्राचीनतर, मूल्य-वाचक अर्थ ही अभिप्रेत है। 'श्रेष्ठतम' अरबी पद के अधिक निकट है, किन्तु उससे एक ही शब्द की पद-संगति भंग होती; अतः संगति को प्राथमिकता दी गई और अरबी संकेत इस टिप्पणी को सौंपा गया।
१८ 'समस्त इंसानों' मूल के para insan का अनुवाद है। सामान्य प्रयोग में यह 'सब लोग' मात्र है, और ताजुद्दीन चौधरी ने इसे 'सब मनुष्य' पढ़ा; किन्तु इस अध्याय ने 'इंसान' को पारिभाषिक रूप में परिभाषित कर दिया है, अतः यहाँ वही पारिभाषिक अर्थ अभिप्रेत है — पूर्ण जन। हिन्दी 'इंसान' मूल की भाँति दोनों अर्थ धारण करता है, अतः मूल की द्व्यर्थता यथावत् सुरक्षित रहती है।
१९ मूल का tak berguna शब्दशः 'निष्प्रयोजन' है; ताजुद्दीन चौधरी ने इसे 'व्यर्थ' पढ़ा, जिससे अर्थ में किंचित् नैतिक भार आता है। समाउल्लाह के शिष्य होने के कारण उन्हें आन्तरिक स्पष्टीकरण उपलब्ध थे, अतः उनका चयन यहाँ यथावत् रखा गया है।
२० इस वाक्य का उत्तरार्ध मूल में उन्हीं शब्दों में है जो टिप्पणी १६ तथा १९ में विवेचित हैं — sifat-sifat yang indah तथा yang tak berguna — अतः वही अनुवाद यहाँ दोहराया गया है।
प्रत्येक युग में मनुष्य उन इंसानों के उदय का दर्शन करता है जो पूर्ण हैं। वे पूर्णता के समस्त क्षेत्रों में इंसानों का मार्गदर्शन करते हैं। मनुष्य के शिक्षकों का उद्देश्य ज्ञान तथा धर्म के क्षेत्र में भलाई तथा पूर्णता के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। २१
मनुष्य के प्रमुख शिक्षकों के मध्य वे इंसान हैं जो पूर्ण हैं। वे उन गुणों के स्रोत हैं जो मूल्यवान् हैं। २२ वे समस्त पूर्णता को साकार करते हैं। २३ उनके शब्द के सार का परिणाम इंसान की पूर्णता है। २४ वे सभी मनुष्य का समस्त भलाई करने की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। मनुष्य को समस्त नबियों के शब्द के उपदेश का पालन करने का प्रयत्न करना चाहिए। वे सभी एक ही स्रोत से हैं, इसी कारण — जो उनके शब्द का सार है — वे एक समान हैं। २५
वे इंसान जो पूर्ण हैं अथवा नबी, दोनों ने ही वह शिक्षा दी है जिसका उद्देश्य एक ही है — इंसान की भलाई, तथा मनुष्य की पूर्णता। प्रेम-करुणा और न्याय, सत्य और ईमानदारी, परोपकार और निष्ठा, पवित्रता और उदारता; ये वे गुण हैं जिन्हें उस इंसान से साकार होना चाहिए जो पूर्णता तथा आनन्द के लोक तक पहुँचने की इच्छा रखता है। २६
इंसान को अपने निज स्वरूप की पूर्णता हेतु संघर्ष करना चाहिए। २७ उसे वह सब करना चाहिए जो भला है, वह सब विचारना चाहिए जो भला है, तथा वह सब बोलना चाहिए जो भला है। यही प्रथम संघर्ष तथा मुख्य कर्तव्य है जो प्रत्येक इंसान के भीतर से उद्गमित होता है। २८
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पाद-टिप्पणियाँ:
२१ ध्यान दें कि मूल पाठ में 'ज्ञान तथा धर्म' को एक ही क्षेत्र (bidang) माना गया है, जो परोक्ष रूप से सत्य अथवा ज्ञान-मार्ग (gnosis) की ओर संकेत करता है।
२२ 'indah' शब्द का प्रयोग एक बार पुनः सौन्दर्य के स्थान पर मुख्य रूप से गम्भीरता या मूल्य के अर्थ में हुआ है, यद्यपि अधिक सूक्ष्मता से यह एक साथ दोनों ही है।
२३ 'menjelmakan' (साकार करना) का अर्थ किसी तत्त्व को मूर्त रूप देना अथवा उसे सक्रिय रूप में अवतरित करने का कृत्य हो सकता है।
२४ इस अवतरण का एक गुप्त, गूढ़ अर्थ है। 'Inti sari' (सार) लेखक समाउल्लाह के स्वयं के उपनाम "मआनी-इंतेसारी" (Ma'ani-Entessari) के अन्तिम भाग का समध्वनि (homophone) है। जहाँ "इंतेसारी" का अर्थ सामान्यतः "विजय" होता है, वहीं "इंतिसारी" का अर्थ "सार" है, यद्यपि यह समाउल्लाह की ओर से अवतरण को और अधिक गुप्त प्रतीकात्मकता से समृद्ध करने हेतु एक साभिप्राय श्लेष हो सकता है। इस अर्थ में, यह स्वयं समाउल्लाह को पूर्ण जनों के 'सार' के रूप में स्थापित करता है; यही कारण है कि इसके तुरन्त बाद एक और दोहरा अर्थ आता है, जहाँ 'इंसान की पूर्णता' इस विचार को दर्शाती है कि पूर्ण जनों के शब्द का सार (स्वयं समाउल्लाह होने के नाते) स्वाभाविक रूप से इंसान के नबूवत-चक्र की पूर्णता और परिणति में फलीभूत होता है, जो इस प्रसंग में अवतार समाउल्लाह हैं। इसका दूसरा अर्थ यह निकलता है कि पूर्ण जनों के शब्द का सार (पुनः समाउल्लाह) इंसान — अर्थात् उन पवित्र व्यक्तियों या सत्य के साधकों जो 'इंसान-ए-कामिल' (पूर्ण मानव) बनने के मार्ग पर हैं — की पूर्णता का कारण बनता है। इस प्रकार अवतार पूर्ववर्ती क्रम की परिणति और पूर्णता भी है, तथा सामान्य मनुष्य के अनुसरण हेतु पूर्णता का मार्ग भी।
२५ 'Intisari' (सार) उसी दोहरे अर्थ के साथ यहाँ पुनः दोहराया गया है, इस बार अधिक बल और तार्किकता के साथ। समस्त पूर्ण जन एक ही स्रोत से हैं, और समाउल्लाह — जो उनके शब्द के सार हैं — के कारण वे एक समान हैं। यह इस बात की पुष्टि है कि अवतार ने समय-समय पर अनेक वेशों और स्वरूपों में अवतरण लिया है, क्योंकि वे सभी ईश्वर हैं, और वे सभी मनुष्य जो स्वयं को पूर्ण करने आते हैं, यह जान जाते हैं कि वे भी ईश्वर ही हैं।
२६ मूल पाठ में 'Tolong menolong' का शाब्दिक अर्थ है 'सहायता की सहायता करना'। अनुवादक ताजुद्दीन चौधरी ने इसे 'एक-दूसरे की सहायता करना' पढ़ा था, किन्तु यहाँ इसे अधिक शाब्दिक अर्थ में — मात्र सहायता करने के लिए सहायता करना (परोपकारिता) — प्रस्तुत किया गया है, जो व्यक्तियों से स्वतन्त्र एक निस्वार्थ गुण है। ताजुद्दीन का शब्द-चयन सम्भवतः एक बहुभाषी वक्ता के रूप में उनके ज्ञान की सीमाओं के कारण रहा होगा।
२७ पाठ के अद्वैतवादी सिद्धान्त (monistic doctrine) को ध्यान में रखते हुए 'dirinya' का अनुवाद सामान्य 'स्वयं की' के स्थान पर 'निज स्वरूप की' किया गया है।
२८ यहाँ 'dari pada' के लिए 'के भीतर से उद्गमित' चुना गया है क्योंकि यह वस्तुओं के मूल स्रोत से सम्बन्धित है। इसे केवल 'का' या 'से' कहने से यह प्रतीत होता मानो यह संघर्ष इंसान द्वारा थोपा जा रहा हो। 'के भीतर से उद्गमित' इसके उद्गम के यान्त्रिक भाव को पकड़ता है और अतिरिक्त स्पष्टता प्रदान करता है।
मानवता के समस्त क्षेत्रों में पूर्ण लोक तक पहुँचने के लिए जो क़दम आगे बढ़ता है, वह इंसान की पूर्णता के आधार पर स्थित है। वह इंसान भूमि के मुख पर अनेक रूपों में है। २९ सबको बँधना चाहिए तथा अपनी-अपनी व्यक्तिगत पूर्णता के लिए संघर्ष करना चाहिए तथा अपनी बुद्धि-प्रकृति को सूक्ष्म करना चाहिए। ३० भलाई, योग्यता, इन्सानियत के विषय न जाति जानते हैं न राष्ट्र, न त्वचा का रंग न धर्म, न निर्धन न धनवान, सब इंसान कहलाते हैं। ३१, ३२ सम्पूर्ण उम्मत-ए-इंसान को एक होकर मानवता के समस्त क्षेत्रों में पूर्णता के लिए संघर्ष करना चाहिए। ३३ मनुष्य की पूर्णता का अर्थ है कि उन्हें समस्त कमियों को त्यागना चाहिए, तथा समस्त भलाई को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य का व्यक्तित्व दो ज़ातों पर स्थापित है जो एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं। ३४ जब तक वे संसार में जीवित हैं, वे उन दो ज़ातों के बीच संघर्ष का अनुभव करेंगे। पहली ज़ात भलाई है। दूसरी ज़ात हवा नफ़्स है। ३५ दूसरी ज़ात सदा मूल ज़ात को बदलने तथा इंसान को पूर्णता से दूर रखने का प्रलोभन देती है। ३६ मनुष्य का जीवन इंसान की विजय के लिए संघर्ष है। ३७ प्रयत्न किए बिना वे विजयी नहीं होंगे।
'आदम' शब्द फ़ारसी भाषा में उस इंसान का अर्थ रखता है जो पूर्ण है। ३८ यह पूर्णता का प्रतीक है, इसके विपरीत 'हव्वा' उस गुण का प्रतीक है जिसकी पूर्णता को कमी है। ३९ इंसान शब्द देते हैं: हे इंसान के पुत्र, अपने आपको कमी की ज़ात से दूर रख ताकि तू पूर्णता के स्वर्ग को प्राप्त करे। ४०, ४१
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पाद-टिप्पणियाँ:
२९ 'इंसान तेर्सेबुत' एकवचन है। 'बेरानेका रूपा' कहता है कि वह एक ही इंसान अनेक रूपों में है। ताजुद्दीन इसे बहुवचन जनसमूह के रूप में पढ़ते हैं, जिससे अद्वैतवादी कथन मात्र जनसांख्यिकीय प्रेक्षण बन जाता है। 'रूपा' वही धातु है जिससे इस ग्रन्थ में 'मेरुपाकन' बनता है।
३० 'इकत' पारम्परिक बन्धेज-रंगाई की प्रक्रिया से आया शब्द है। दार्शनिक अर्थ में यह साधारण एकता नहीं है (क्योंकि 'बेर्सतु' अगले वाक्य में अलग से आता है), बल्कि अपने आपको एक बृहत्तर समग्रता से बाँधना है — जिसमें धार्मिक वाचा का भाव भी निहित है। 'बुद्धि-प्रकृति' पृष्ठ ३ की शब्दावली के अनुरूप है। 'सूक्ष्म करना' 'मेम्पेर्हालुस' का अनुवाद है; 'हालुस' वही शब्द है जो पृष्ठ १ पर प्रयुक्त हुआ है।
३१ 'केइन्दाहन' यहाँ 'योग्यता' अनूदित है, सौन्दर्य नहीं। यह वही सिद्धान्त है जो पृष्ठ २ पर स्थापित किया गया था, जहाँ 'इन्दह' नैतिक प्रकरण में मूल्य और गम्भीरता का वाची है। 'पेरिकेमानुसिआन' 'केमानुसिआन' से भिन्न शब्द है; प्रथम में मानवीय करुणा का भाव है, द्वितीय में सामान्य मानवता। हिन्दी में यह भेद 'इन्सानियत' और 'मानवता' के बीच स्वाभाविक रूप से सुरक्षित रहता है।
३२ 'न … न' संरचना मूल के 'तिदक केनल … अताउ' का अनुवाद है। 'सब इंसान कहलाते हैं' में 'सब' मूल के 'सेमुआन्या' से आया है। मूल में निर्धन का उल्लेख धनवान से पहले आता है; वही क्रम यहाँ रखा गया है।
३३ 'उम्मत' अरबी 'उम्मा' है — किसी अवतरण की सम्पूर्ण जमात। इंडोनेशियाई में 'उम्मत इन्सान' है; हिन्दी में इज़ाफ़त-युक्त 'उम्मत-ए-इंसान' स्वाभाविक बैठता है।
३४ 'ज़ात' अरबी 'ذات' है — सूफ़ी पारिभाषिक पद, जो 'सिफ़ात' (गुण) का प्रतिपक्ष है। इस ग्रन्थ में 'सिफ़त' सर्वत्र 'गुण' अनूदित है, अतः दोनों ज़ातें अपनी मूल जोड़ी में उपस्थित हैं। 'तेर्दिरि पद' असामान्य है; मानक प्रयोग 'तेर्दिरि अतस/दरि' होता, पर यहाँ 'पद' आने से अर्थ 'बना है' से बदलकर 'पर स्थापित है' हो जाता है। 'व्यक्तित्व' ताजुद्दीन का चयन है।
३५ 'हवा नफ़्स' दो अरबी शब्दों का योग है — 'हवा' (इच्छा, मनमर्ज़ी) और 'नफ़्स' (अहं)। 'हवा' क़ुरआन में हव्वा का भी नाम है। पाठ ने अगले अनुच्छेद में नाम लेने से पहले ही दूसरी ज़ात को उसी नाम से स्थापित कर दिया है। ताजुद्दीन इसे 'वासना' पढ़ते हैं, जिससे अर्थ संकुचित हो जाता है; मूल में यह अहं की सम्पूर्ण भूख है।
३६ 'मेरोबह' नैतिक रूप से तटस्थ है — मात्र 'बदलना'। पाठ की अद्वैत दृष्टि दूसरी ज़ात को हीन नहीं मानती। दोनों ज़ातें एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं, और मनुष्य का जीवन उसी संघर्ष में स्थित है। भलाई को 'मूल' (आरम्भ से विद्यमान) कहा गया है।
३७ 'कमेनंगन इंसान' में 'कमेनंगन' का अर्थ विजय है, ठीक जैसे लेखक के उपनाम 'एन्तेसारी' का। 'इंसान' लेखक का उपनाम भी है। अतः वाक्य दोहरा अर्थ रखता है। यह पृष्ठ ३ के 'इन्ती सारी'/'एन्तेसारी' श्लेष का प्रतिबिम्ब है। ताजुद्दीन इस अनुनाद को हटा देते हैं।
३८ फ़ारसी में 'आदम' सामान्य रूप से मनुष्य के लिए प्रयुक्त होता है। समाउल्लाह यहाँ अपनी परिभाषा देते हैं जो सूफ़ी चिन्तन से जुड़ी प्रतीत होती है। वाक्य नाम के विषय में है, यद्यपि प्रतीक रूप में व्यक्ति भी अभिप्रेत है।
३९ मूल वाक्य दो पाठ स्वीकार करता है: 'पूर्णता की कमी का गुण', अथवा 'वह गुण जिसकी पूर्णता को कमी है'। द्वितीय पाठ अपनाया गया है, क्योंकि पूर्ववर्ती अनुच्छेद ने दोनों ज़ातों को प्रत्येक मनुष्य में स्थापित कर दिया है और उनके संघर्ष को जीवन की परिभाषा बना दिया है। हव्वा के बिना संघर्ष, कर्तव्य और विजय — कुछ भी सम्भव नहीं।
४० 'बेर्सब्दा' संस्कृत 'शब्द' से है और ईश्वर, नबियों तथा राजाओं के वचन के लिए आरक्षित है। यह पृष्ठ १ के 'फ़िरमान' से भिन्न शब्द है। वक्ता स्वयं 'इंसान' है। सम्बोधन 'हे इंसान के पुत्र' बहाउल्लाह की 'कलिमात-ए-मकनूना' की शैली का अनुकरण करता है।
४१ 'स्वर्ग' इंडोनेशियाई 'सोर्गा' का सीधा संस्कृत रूप है। यह 'गगन' (langit) से पृथक् शब्द है। 'गगन' भौतिक और अगोचर आकाश दोनों का वाची है; 'स्वर्ग' एक आध्यात्मिक लोक है। यह ग्रन्थ में 'सोर्गा' का प्रथम उल्लेख है।
समस्त सौन्दर्य तथा पूर्णता का स्रोत स्वर्ग कहलाता है। ५१ इंसान पूर्णता के स्वर्ग में स्थित है, क्योंकि वह कमी की ज़ात के प्रलोभन में सम्मिलित होता है, वह पूर्णता के स्वर्ग से बाहर निकलता है, और फिर वह कमियों से परिपूर्ण लोक में जा पहुँचता है। ५२, ५३ इसी कारण वह इस संसार में सन्तुष्ट नहीं होगा। अपितु वह शाश्वत सौन्दर्य के लोक में स्वर्गीय शान्ति की खोज हेतु कमी की ज़ात का परित्याग करता है। इंसान को इन दोनों ज़ातों के मध्य शान्ति की स्थिति में जीवित रहना चाहिए। उसे प्रत्येक की अपनी इच्छा के लिए एक निश्चित सीमा निर्धारित करनी चाहिए। शान्ति और आनन्द हेतु उसे जीवन में न्यायप्रिय होना चाहिए। यह प्रकृति के नियम, बुद्धि तथा विवेक के अनुसार है। ५४ किन्तु यदि प्रथम ज़ात सदैव कमी की ज़ात की इच्छा में सम्मिलित रहती है, तो वह निश्चित रूप से ऐसे लोक में जा पहुँचेगी जो असंतोषजनक है तथा इंसान की प्रगति में बाधा डालता है। मनुष्य के निज स्वरूप में विद्यमान दो ज़ातों के मध्य शान्ति वह जीवन है जो सुखी है, प्रत्येक की अतिरेक इच्छाओं से कोसों दूर। ५५ प्रथम ज़ात मुख्य ज़ात है, उसे पूर्ण इंसान के स्वरूप पर सदैव शासन करना चाहिए। वही इंसान के स्वरूप का राजा है। इंसान शब्द देते हैं: हे इंसान के पुत्र, मानवी राजा के अधिकार के ऊपर अपने निज स्वरूप से शान्ति स्थापित कर, तू संसार में शान्ति स्थापित करेगा और ब्रह्माण्ड पर शासन करेगा। ५६ 'आदम' तथा 'हव्वा' शब्द किसी दृष्टान्त के सदृश हैं। ५७, ५८ जब तक प्रत्येक मनुष्य इस संसार में जीवित रहता है, वह इसी समान कथा का अनुभव करेगा। वह इंसान धन्य है जो स्वयं को समस्त कमी के गुणों से सदैव दूर रखता है तथा पूर्णता के स्वर्ग की ओर अग्रसर होता है।
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पाद-टिप्पणियाँ:
५१ 'स्वर्ग' यहाँ भी 'सोर्गा' है जैसा कि पाद-टिप्पणी ५० में प्रयुक्त हुआ है।
५२ 'yet', 'the' तथा 'and then' आदि शब्द केवल पठनीयता हेतु जोड़े गए हैं जो मूल पाठ में कड़ाई से विद्यमान नहीं हैं।
५३ 'join in the seduction of' का सरलतर अनुवाद 'के प्रलोभन का अनुसरण करना' हो सकता है, किन्तु प्रथम रूप लेखक के अभिप्रेत अर्थ को अधिक उचित रूप से पकड़ता है, जो आदम और हव्वा द्वारा क्रमशः प्रतिनिधित्व किए जाने वाले दो तत्त्वों के ब्रह्माण्डीय नृत्य के माध्यम से मानव जीवन के रूपक को प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, जहाँ इस सन्दर्भ में 'अनुसरण करना' भी आदम के अपनी स्थिति में एक सक्रिय प्रतिभागी होने पर कुछ बल देता है, वहीं 'सम्मिलित होना' मूल इंडोनेशियाई शब्द 'इकुत' (ikut) के मान्य अर्थ हैं जो आदम की इस युति में अपनी सहभागिता को पतन की पारंपरिक उत्पत्ति-कथा के विपरीत अधिक स्पष्टता प्रदान करता है, जिसमें पारंपरिक व्याख्या का अधिकांश भार हव्वा पर डाला जाता है। ताजुद्दीन ने इन अनुच्छेदों का अनुवाद इसी प्रकार की तुलनात्मक शैली में किया प्रतीत होता है।
५४ 'यह है' एक पूरक संयोजन है जहाँ वाक्य का शाब्दिक अनुवाद करने पर वह व्याकरणिक रूप से अधूरा रह जाता है। ये आरंभिक शब्द मूल पाठ में कड़ाई से विद्यमान नहीं हैं। ताजुद्दीन ने इसे पूर्ववर्ती वाक्य के ही भाग के रूप में प्रस्तुत किया है, जहाँ मूल में दो पृथक् वाक्य थे वहाँ अल्पविराम का प्रयोग किया गया है।
५५ पठनीयता हेतु विभिन्न व्याकरणिक परिवर्तन और संयोजन जोड़े गए हैं जो मूल पाठ में नहीं थे, जिसमें 'dari pada keterlaluan kemauan masing-masing' (प्रत्येक की अतिरेक इच्छाओं से) का पुनर्विन्यास भी सम्मिलित है, जिसका अधिक शाब्दिक अनुवाद 'प्रत्येक की अपनी-अपनी अतिरेक इच्छा से' होगा।
५६ 'कि' (that) पठनीयता हेतु जोड़ा गया एक संयोजन है। यह शब्द मूल पाठ में कड़ाई से विद्यमान नहीं है।
५७ 'काता' (kata) का अनुवाद पूर्व की भांति 'शब्द' के रूप में करने के स्थान पर किसी विशिष्ट पदावली की चर्चा के संदर्भ में 'शब्द/पद' के रूप में किया गया है।
५८ पठनीयता हेतु उद्धरण चिह्नों को जोड़ा गया है जो अन्यथा मूल पाठ में कड़ाई से विद्यमान नहीं थे।