मानवता-ग्रन्थ

जीव ईश्वर का दृष्टान्त है। जीवन्त ब्रह्माण्ड न काल जानता है, न समय। सदा-सर्वदा वह विद्यमान है, वह नित्य जीवित रहता है। ब्रह्माण्ड का जीव अत्यन्त उच्च, सूक्ष्म और असीम गगन के समान है। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त करता है। वह सर्वत्र विद्यमान है, उस परोक्ष गगन के समान जो समस्त वस्तुओं को व्याप्त करता है, चाहे वे दृश्य हों अथवा अदृश्य। समस्त परम पूर्णता का स्रोत ब्रह्माण्ड का जीव है। समस्त नित्य सौन्दर्य का स्रोत उसी में है। समस्त परम ज्ञान का स्रोत वही है। शक्ति के समस्त रहस्यों का स्रोत वही है। राज्य, वचन तथा समस्त वस्तुएँ उसी में हैं। महापवित्र है वह समस्त पूज्यों से परे, वही ब्रह्माण्ड का राजा और सम्पूर्ण आकाश का प्रकाश है। वही ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता है। वही ईश्वर का परोक्ष गगन है जो समस्त वस्तुओं में महाव्यापी है, गुण अथवा नाम से परे पवित्र, वही एक है, नित्य और शाश्वत।

वही आदि और अन्त है। वही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का साक्षात् सृष्टिकर्ता है। महापवित्र है वह समस्त वाणी और शब्द से परे, वह सदा-सर्वदा जाना न जाएगा।

इंसान महाकृपालु ईश्वर के गगन से विनती करता है, अपनी परम महिमामयी रहमत से इंसान पर करुणा कर१०, ताकि वह तेरे परम सुन्दर मुख के प्रकाश को जान सके। वही ब्रह्माण्ड का अल्लाह११ है।

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पाद-टिप्पणियाँ:

१ शीर्षक में 'ग्रन्थ' शब्द 'पुस्तक' अथवा 'किताब' के स्थान पर चुना गया है; हिन्दी प्रयोग में 'ग्रन्थ' धर्मग्रन्थ एवं प्रामाणिक कृति का द्योतक है, जो इस पाठ की प्रतिष्ठा के अनुरूप है।

२ मूल शब्द jiwa संस्कृत 'जीव' ही है, और इस अनुवाद में वह अपने मूल रूप में लौटा है। मूल पाठ एक ही शब्द से व्यष्टि के जीव और ब्रह्माण्ड के जीव को कहता है — दोनों का एकत्व ही इस ग्रन्थ की शिक्षा है — अतः दोनों अर्थों में एक ही शब्द 'जीव' रखा गया है। वस्तुतः मूल पाठ संस्कृत-मूल शब्दावली से समृद्ध है: jiwa (जीव), maha (महा), nama (नाम), raja (राजा), kerajaan (राज्य), karunia (करुणा), angkasa (आकाश), pujaan (पूजा-मूल), semesta (समस्त)। अतः यह अनुवाद अनेक स्थलों पर अनुवाद नहीं, मूल धातुओं की पुनःस्थापना है। maha को वहाँ 'महा' रखा गया है जहाँ हिन्दी समास सहज है (महापवित्र, महाकृपालु, महाव्यापी), अन्यत्र 'परम' — जो स्वयं संस्कृत है। 'alam semesta' हेतु मानक 'ब्रह्माण्ड' रखा गया है, जो स्वयं संस्कृत है।

३ मूल शब्द kiasan अलंकार-सामान्य (उपमा, रूपक, प्रतीक आदि) का व्यापक वाची है; निकटतम एकल पद के रूप में 'दृष्टान्त' चुना गया है।

४ शब्दशः पाठ होगा 'ब्रह्माण्ड का जीवन'; समाउल्लाह के सचिव एवं अनुवादक ताजुद्दीन चौधरी ने इसे 'जीवन्त ब्रह्माण्ड' पढ़ा। यह विरल व्याख्यात्मक चयन यहाँ यथावत् रखा गया है।

५ langit gaib इस पाठ से पूर्ववर्ती इस्लामी रहस्यवादी अवधारणा है ('आलम-ए-ग़ैब') — सत्ता का वह अगोचर आध्यात्मिक आयाम जो सबमें व्याप्त है। 'परोक्ष' (इन्द्रिय-गोचर से परे) 'ग़ैब' का सटीक संस्कृत प्रतिरूप है और 'अदृश्य' से पृथक् रहता है, जैसे मूल में gaib और tidak kelihatan पृथक् शब्द हैं। langit हेतु 'गगन' चुना गया है ताकि 'आकाश' अपने वास्तविक सजात angkasa के लिए सुरक्षित रहे।

६ मूल में यह वाक्य खण्डित है; पूर्ववर्ती वाक्यों से अन्वित 'वही है' पठनीयता हेतु जोड़ा गया है।

७ मूल में sifat (अरबी 'सिफ़ात') — ईश्वरीय गुणों का पारिभाषिक पद; 'गुण' उसका प्रतिष्ठित भारतीय प्रतिरूप है। गुण और नाम से परे परम सत्ता की यह घोषणा वही सिद्धान्त है जिसे भारतीय परम्परा 'निर्गुण' कहती है। तथापि मूल पाठ पारिभाषिक पद नहीं, वर्णनात्मक वाक्यांश प्रयोग करता है; अतः अनुवाद भी वाक्यांश ही रखता है और सैद्धान्तिक अभिज्ञान इस टिप्पणी को सौंपता है।

८ मूल में द्वितीय उल्लेख पर pencipta (सृष्टिकर्ता) के आगे sang जुड़ता है — सम्मानित सत्ताओं हेतु प्रयुक्त एक नाटकीय-आदरसूचक उपपद। हिन्दी में यह भाव 'साक्षात्' द्वारा व्यक्त किया गया है।

९ 'इंसान' मूल का शब्द ज्यों का त्यों है और हिन्दी में पूर्णतः प्रचलित है। यह 'इंसान-ए-कामिल' (पूर्ण मानव) की अवधारणा की ओर संकेत करता है: सन्त वे हैं जिन्होंने स्वयं को शुद्ध कर यह पद पाया। यह ग्रन्थ 'अल-इंसान' द्वारा और इंसान के लिए लिखा गया है — विनम्र प्रतीत होते हुए भी यह गम्भीर धार्मिक उद्घोष है, जो मनुष्य को पूर्ण सत्ता बनने का मार्ग देता है। 'इंसान' शब्द लिंग-निरपेक्ष है।

१० मूल karunialah प्रत्यक्ष आज्ञार्थ है (-lah प्रत्यय); अनुवाद में भी प्रत्यक्ष विनय-आज्ञा 'करुणा कर' रखी गई है — 'तू' सम्बोधन भक्ति-परम्परा में ईश्वर के आत्मीय सम्बोधन का मानक रूप है। इसी वाक्य में संस्कृत-मूल karunia (करुणा) और अरबी-मूल rakhmat (रहमत) साथ-साथ आते हैं; अनुवाद ने दोनों के मूल स्वरूप सुरक्षित रखे हैं — मूल की द्विस्रोतीय बुनावट का प्रतिबिम्ब।

११ मूल पाठ ईश्वर हेतु सर्वत्र Tuhan का प्रयोग करता है और समापन में सप्रयोजन Allah का — यह दर्शाने हेतु कि जो नामों से परे है, उसे किसी भी नाम से पुकारो, सत्ता एक ही है। अनुवाद इस युक्ति को यथावत् रखता है: सम्पूर्ण पाठ में 'ईश्वर', समापन में 'अल्लाह'। हिन्दी पाठक के लिए यह विशेष बल से उतरती है — ईश्वर कहो या अल्लाह, परमात्मा एक है।